January 19, 2014

मेरठ के कीड़े

Note: Below is a work of fiction. While any resemblance with anyone would be totally coincidental, I have tried to keep it 'believable' by using real places and settings. It should be taken as my commentary and thoughts on one of India's prime social issues.

सरधना कि एक कच्ची सड़क पर स्टेट ट्रांस्पोर्ट कि एक छोटी सी बस दौड़ी चली जा रही थी। अंदर बैठे मास्टर साहब कभी अपनी घडी तो कभी ड्राइवर को देखते। आज फिर स्कूल पहुँचने में देर हो रही थी।  मास्टर साहब सेंट जॉन इंटर कॉलेज में गणित पढ़ाते थे। वे वैसे तो बहुत तल्ख़ मिजाज के व्यक्ति थे और गणित पर विशेष पकड़ के लिए जाने जाते थे। लेकिन घर से स्कूल पंद्रह कोस दूर होने के कारण अक्सर लेट हो जाते थे। नाम था गजेंद्र कुमार शुक्ला लेकिन लोग उन्हें मास्टर जी ही बुलाना पसंद करते थे।

नवंबर का महीना था और सुबह का समय।  हल्की  हल्की सर्द हवा चल रही थी और गुनगुनी धूप में सड़क के किनारे खेतों में लगे सरसों के फूल देखते ही बनते थे। मास्टर साहब को अक्सर खांसी कि शिकायत रहती थी।  शायद ये उनके तुनक व्यवहार का ही परिणाम था। मास्टर साहब ने शॉल कानो पर लपेट ली, और जेब से रुमाल निकाल कर खासने कि क्रिया पूरी की।

सुबह साढ़े आठ बजे  बहुत कम लोगों को ही मास्टर जी के तरह कहीं जाने की आवश्यकता आन पड़ी थी।  बस लगभग आधी ही भरी थी, उनमे ज्यादातर स्कूल के छात्र ही नज़र आते थे।  एक दो छात्र तो स्वयं मास्टर जी की कक्षा के ही थे , और मास्टर जी की तरह लेट चल  रहे थे।  लेकिन जो खुद डाकू हो वो चोर पर क्या ऊँगली करता।  मास्टर साहब ने दूसरी ओर मुंह कर लिया। बस में सभी शांत बैठे थे , शायद मास्टर जी का ही खौफ था।  लेकिन मास्टर जी को कोई शिकायत नहीं थी। घर और स्कूल की  चिल्ल- पोँ के बीच बस में थोड़े सुकून से किसे गुरेज होता।

अचनाक मास्टर जी का ध्यान अपनी सीट से दो सीट आगे बैठे एक युवक और युवती पर गया।  लड़के ने अपने चेहरे पर लाल रंग का रुमाल बाँध रखा था और लड़की ने हरे दुपट्टे से अपना पूरा सर ढका हुआ था।  वो बहुत धीमी आवाज  में कुछ बातें कर रहे थे , लड़की बीच बीच में युवक के कंधे पर अपना सर रख देती।  मास्टर जी को समझते देर न लगी की ये प्रेम प्रसंग का मामला था।  लेकिन लगभग खाली बस में भी दोनों का अपना चेहरा छुपाना मास्टर जी को अटपटा लगा।

मास्टर जी को दूसरों के निजी मामलों में अडंगा देने की गन्दी आदत थी।  थोड़ी देर तक तो वो अपनी सीट पर टिके रहे, लेकिन फिर उनसे रहा न गया।  उठे और युवा जोड़े के बगल वाली खाली सीट पर आकर बैठ गए।  अभी उन्होंने तशरीफ़ भी नहीं रक्खी थी की वो चुहक पड़े "क्यों जनाब कहाँ से हो?" युवती ने तुरंत अपना सर युवक के कंधे से हटाया और चेहरा दूसरी ओर कर दिया।  इससे पहले लड़का कुछ समझ पाता, मास्टर जी ने एक और सवाल दागा - "और ये तुम दोनों ने चेहरा क्यों छुपा रखा है ?"

लड़का जवाब देने के उलट उठ खड़ा हुआ और आस पास देखने लगा। लड़का  लबे कद काठी का लगभग बीस - बाइस साल का युवक प्रतीत होता था।  लम्बे लम्बे बाल और सांवला रंग, कंधे पर एक छोटा सा बैग लटकाया हुआ था।   लड़की ने उसका हाथ कस कर पकड़ा हुआ था। दुपट्टे में चेहरा ठीक से तो नहीं पता लगता था लेकिन उनमे बड़ी बड़ी आँखें और जूड़े में गुंथे बाल जरूर दिख रहे थे। मास्टर जी के अनुमान से लड़की की उम्र भी लगभग उन्नीस बीस कि होगी।

मास्टर जी फिर गरजे - "भाग कर आ रहे हो क्या?" . लड़की ने जोर दिया तो लड़का सीट पर फिर बैठ गया।  चेहरे से रुमाल हटाया, दाढ़ी कई दिनों से नहीं बनाई थी।  आजकल के लड़कों के यही चोंचले हैं , लड़कियों कि तरह लम्बे बाल रखो और गुंडों कि तरह लम्बी दाढ़ी,  मास्टर जी ने सोचा।

लड़के ने मास्टर जी की तरफ नजरें गड़ाई और पलटकर बोला , "कौन हैं आप?"

"मेरा नाम गजेंद्र शुक्ला है। पास के इंटर कॉलेज में पढ़ाता हूँ। बच्चे मुझे मास्टर जी कहना पसंद  करते हैं।  तुम अपनी कहो, क्या नाम है तुम्हारा? "

लड़का फिर चुप हो गया , लड़की उसके पीछे डरी सहमी बैठी थी। वो लड़के के कंधे कि ओट से मास्टर साहब को देख रही थी।

"जी मेरा नाम जावेद है और इसका… इसका नाम महक है।  हम पास के शाहजहांपुर के रहने वाले हैं। "

मास्टर जी मेरठ के नक़्शे से अच्छी तरह वाकिफ थे , भड़क कर बोले  "बेटा शाहजहांपुर यहाँ बगल में नहीं है, कम से कम सौ कौस दूर है, माजरा क्या है ? "

लड़की ने लड़के कि बांह को  और जोर से पकड़ लिया।  लड़का चुप ही रहा।

"अब बोलते हो या करूँ पुलिस को फ़ोन?"

लड़का झल्लाया, "जी कर दीजिये।" मास्टर जी अवाक् रह गए।

"बहुत भाग लिए। बहुत सह लिए।अब मर जाना ही सही लगता है।  कब तक ऐसे ही छुपते रहेंगे।  कहीं काट कर फैंक दिए जाएँ या जला कर ख़ाक कर दिए जाएँ तो वो ही सही है।"

"क्या हुआ बेटे, इतना क्यों भड़क रहे हो?"

"मास्टर साहब बात आप भी खूब जानते हैं।  बात वही है जो आज कल देश के हर छोटे बड़े गाँव-शहर में दोहराई जा रही है। "

"अरे कुछ बताओगे भी या यही गोल गोल घुमाते रहोगे ?"

"मैं और महक शाजहांपुर के पास गफ्फूर मेमोरियल कॉलेज में दो साल से साथ पढ़ते हैं, हमारा घर एक दूसरे से महज पांच कोस दूर है। मैं महक को बहुत चाहता हूँ मास्टर साहब। "

"तो इसमें दिक्कत कि क्या बात है? प्यार करना कोई गुनाह तो नहीं है", मास्टर जी उदार होकर बोले।

"गुनाह प्यार करना नहीं, गुनाह मेरठ के छोटे से कसबे में रहते हुए प्यार करना है। "

"क्या मतलब ?"

"रहने दीजिये मास्टर साहब आप क्या समझेंगे। आपकी पीढ़ी हमें कभी नहीं समझ पायेगी। "

मास्टर जी झुंजला कर रह गए ? एक पल को उन्हें एहसास हुआ की सैंतीस बरस कि उम्र में ही अब वो बूढ़े हो चले थे। बोले, "ऐसा क्या है तुम्हारी पीढ़ी की सोच में जो मैं  नहीं समझ सकता ? तुम ही हो जो अपने बड़ो को कुछ नहीं समझते। क्या हम कभी तुम्हारी उम्र से नहीं गुजरे?"

"माफ़ कीजिये मास्टर साहब, लेकिन आप का समय कुछ और था, जब कुछ पता चलने से पहले ही आपकी शादी किसी से भी कर दी जाती थी।  आज हमें पढ़ाया लिखाया जाता है, आत्मनिर्भर बनने, बड़ा बनने कि तामील दी जाती है। लेकिन अगर हम घरवालों कि मर्जी के बिना किसी को देख भी लें तो आँखें निकाल ली जाती है। "

"तो तुम कहते हो की तुम्हे अपनी मनमानी करने दी जाए? कुछ अच्छा बुरा करो तो उससे रोका न जाए ?"

लड़का जोर से हंसा। लड़की अभी भी चुपचाप सब सुन रही थी।  "जी जरूर रोकिये।  हाथ पैर तोड़ दीजिये कुछ बुरा करें तो। लेकिन मुझे एक बात बताइये कि हमारा कसूर ही क्या है?"

मास्टर जी कुछ नहीं बोले।

"मैं बताता हूँ आपको कि हमारा कसूर क्या है।  हमारा कसूर बस इतना है कि मैं कुरैशी और ये अंसारी है। ये है हमारा कसूर, की हम एक गाँव में एक जात में पैदा नहीं हुए। हमारा कसूर ये है की हमने हमारे माँ-बाप से पूछे बिना मोहब्बत कर ली, जैसे की  उनसे पूछ लेते तो वो ख़ुशी ख़ुशी राजी हो जाते।"

"तो क्या हो गया, अब जाके बोल दो। "

"क़यामत आ जायेगी मास्टर साहब अगर हमारे घर वालों को इसकी भनक भी लग गयी तो। कुछ रोज पहले इसने अपनी अम्मी को हमारे बारे में बताया था।  पता है उन्होंने क्या किया ?"  उसने लड़की का हाथ पकड़ कर आगे किया। उसकी बांह नीली पड़ी हुई थी और कलाई पर जले के निशान थे।

"जानवरो की तरह मारा इसे। और जब जी भर गया तो जलता कोयला इसके हाथ पर रख दिया।और अगर कहीं इसके अब्बा को खबर पड़ जाती तो आज इसकी लाश भी न मिलती।" लड़की ने हाथ पीछे खींच लिया।

"और मेरे बड़े कुरैशी साहब पता है क्या कहते हैं? कहते हैं की तू गोश्त खा, हड्डी क्यों गले में टांगना चाहता है। छी। " …लड़के की आँखों में जलजला सा आ गया था।  लड़की उसके पीछे बैठी सिसकने लगी।

मास्टर जी के पास बोलने को कुछ नहीं था।

"मुझे लगता था की कुछ बन जाऊँगा तो इसके घर जाकर इसका हाथ मांग लूंगा।  लेकिन अब मुझे यकीन हो गया है कि इस वहशत में हमें कोई नहीं समझेगा।  मास्टर साहब मुझे एक बात बातइये, ये कहाँ का रिवाज है कि कुरैशी को कुरैशी ही मिलेगी और अंसारी अंसारी के पल्ले ही बाँधी जायेगी?"

"लेकिन समाज के भी कुछ उसूल होते हैं। "

"अजी लानत है ऐसे उसूल पर, जहां लड़की खुद किसी को पसंद कर ले तो वो ज़माने भर में  बेपर्दा हो जाती है। ये रिवाज अच्छा है की  घरवालो कि झूठी शान के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी खराब कर लो।अभी आज कोई हमें साथ देख ले तो खुदा-कसम बीच बाजार में काट कर लटका दिए जायेंगे। इसीलिए घर से सौ कोस दूर कॉलेज छोड़ कर यहाँ कुछ वक्त साथ बिताने अक्सर आते हैं। "

"तो बेटा तुम्हे इतनी ही मुहब्बत है तो मेरठ जैसे छोटे दकियानूसी शहर में क्या कर रहे हो, जाओ कहीं दूर मॉडर्न जगह जाकर अपनी दुनिया बसाओ। ", मास्टर जी ने व्यंग के लहजे से कहा।

"बस यही परेशानी का सबब है मास्टर साहब।  ये हराम-जादी अपने घरवालो को नहीं छोड़ सकती। चाहे वो इसकी बोटी बोटी कर दें, लेकिन ये घरवालों की आबरू नहीं जाने देगी। और मैं मरता मर जाऊँगा लेकिन इसे नहीं छोड़ सकता। "

मास्टर जी को शर्मिंदिगी महसूस हुई। इससे पहले वो कुछ और कहते लड़का उठ खड़ा हुआ। उसने लड़की का हाथ पकड़ा और आगे बढ़ गया।

बस के गेट पर पहुँच कर, लड़का एक पल के लिए रुका और वही से बोला, " हम मेरठ के कीड़े हैं मास्टर साहब।  हमारी यही औकात है। यहाँ की नालियों में जीना और यही कुचल कर मार दिया जाना। आप चिंता न कीजियेगा।"

मास्टर साहब का ध्यान एक पल के लिए लड़की पर गया। उसके होठ और गले पर भी गहरे  निशान थे। बस रुकी और दोनो नीचे उतर गए।

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