July 12, 2012

लौट आओ , बस एक बार

सालों  बीत गए,
लेकिन आज भी,
कभी कभी दर्द उठता है,
कभी कभी चुभन होती है,
जब अचानक तुम्हारी याद आती है.

लोग कहते हैं,

समय बड़ा बलवान होता है,
सारे घाव भर देता है,
शायद सच भी है,
क्योंकि अब खून नहीं रिसता,
अब आँसू नहीं निकलते.

पर दर्द तो आज भी होता,

साँसों में तड़प तो आज भी होती है,
काश बाहर के घाव नहीं भरते,
काश आँखें नहीं सूखती,
शायद कोई ये तकलीफ देख पाता,
शायद कोई दर्द कम कर पाता.

तुम्हारे जाने का गम नहीं,

जाना तो आखिर सभी को है,
गिला बस इतना है तुमसे,
तुम चली गयीं, और मुझे इत्तेला भी ना किया,
या शायद... शायद बतलाया भी हो कभी,
शायद मैं बदनसीब ही समझ ना सका.

हँसता हूँ किस्मत पर अपनी कभी कभी,

इतने साल लगा दिए तुम्हें समझने में,
और जब तक समझा,
तुमने रुकना मुनासिब नहीं समझा,
तुम रहती थी तो जलन होती थी,
और  आज नहीं हो तो चुभन होती है.

तुम्हें जाना था, तुम चली गयीं,

तुम्हें रोकने का शायद हक भी मुझे ना था,
पर यादें तो तुम अपनी यही छोड़ गयीं,
कहो ये हक तुम्हें किसने दिया?
अब तुम ही बताओ, इन यादों का मैं करूँ,
ये यादें मुझे जीने नहीं देतीं.

धीरे धीरे ही सही, तुम बिन जीना सीख रहा हूँ,

घुट घुट ही सही, सांसे लेना सीख रहा हूँ,
जो खुशियाँ तुम्हें ना दे पाया,
जिस सुकून के लिए तुम तडपती रही,
वो अब अपनों को देना सीख रहा हूँ.

लौट आओ, बस एक बार,
अगर हो सके तो,
गलती मेरी क्या थी, मुझे बता दो.
अरे गलत तो तुम हो,
तुम कभी अकेली नहीं थी,
अकेला तो तुम मुझे कर गयीं.